नागपुर और विदर्भ में बाल तस्करी व बाल मजदूरी के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद पुनर्वास और जांच की प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों ने व्यवस्था की चुनौतियां सामने ला दी हैं।
राहुल गुप्ता
नागपुर, 8 अक्टूबर। अपना घर, खेल का मैदान और मां का आंचल छोड़कर दूर लाए गए बच्चों को कई जगह बिना पर्याप्त सुरक्षा के खतरनाक और भारी काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। रहने के नाम पर छोटे-छोटे कमरों में कई बच्चों को ठूंसकर रखा जाता है। काम के घंटे और सुरक्षा के नियमों का भी पालन नहीं होता। बीमार पड़ने पर इलाज की व्यवस्था भी अक्सर भरोसे के सहारे छोड़ दी जाती है।
मानवाधिकारों के इस उल्लंघन का पता समय-समय पर होने वाली कार्रवाई से चलता है। ट्रेन, रेलवे स्टेशन, कारखानों और कंपनियों में संदिग्ध परिस्थितियों में बच्चे मिलने के बाद बचाव अभियान चलाया जाता है। इसके बाद पूछताछ, एफआईआर और दस्तावेजी कार्रवाई तो होती है, लेकिन कार्रवाई के आगे की तस्वीर अक्सर सामने नहीं आती।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बच्चों को काम पर लगाने में कौन-कौन लोग शामिल थे और उन्हें यहां तक कौन लेकर आया। कई मामलों में जांच कथित रूप से मुख्य सूत्रधारों तक पहुंचने से पहले ही धीमी पड़ जाती है। गांधीबाग, तहसील, बुटीबोरी और वाडी की कंपनियों में हुई कार्रवाई के उदाहरणों का हवाला देते हुए सवाल उठाया जा रहा है कि संबंधित विभागों की कार्रवाई का दायरा केवल बच्चों की बरामदगी तक सीमित क्यों रह जाता है।
एनसीपीसीआर के अभियान में हजारों बच्चों का रेस्क्यू
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने 12 जून से 31 अगस्त 2026 तक देशभर में विशेष पैन इंडिया रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन कैंपेन चलाया। अभियान के दौरान जिलाधिकारियों, श्रम विभाग, पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों को बचाव कार्रवाई, एफआईआर, पुनर्वास और बच्चों की शिक्षा में दोबारा शामिल किए जाने से जुड़ी जानकारी देने को कहा गया था।
सरकार की ओर से 4 सितंबर को जारी जानकारी के अनुसार, इस अभियान के दौरान देशभर में 3,800 से अधिक बच्चों को बचाया गया और 575 से अधिक एफआईआर दर्ज की गईं। नागपुर और विदर्भ में हुई कार्रवाई को लेकर हालांकि यह सवाल उठ रहा है कि बचाए गए बच्चों के पुनर्वास और आगे की जांच के लिए संबंधित विभागों के बीच कितना प्रभावी समन्वय है।
कानून सख्त, लेकिन कार्रवाई का असर कितना?
बाल तस्करी और बाल मजदूरी के खिलाफ कानून में कड़ी सजा का प्रावधान है। गंभीर मामलों में आरोपियों को आर्थिक दंड के साथ लंबी अवधि की सजा हो सकती है। इसके बावजूद बच्चों को मजदूरी के लिए दूसरे स्थानों पर ले जाने और खतरनाक काम में लगाने के मामले सामने आते रहते हैं।
बाल अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल बच्चों को छुड़ाना पर्याप्त नहीं है। उनके पुनर्वास, शिक्षा और सुरक्षित घर वापसी के साथ-साथ उन लोगों की पहचान और कार्रवाई भी जरूरी है, जो बच्चों को काम पर लगाने या उन्हें वहां तक पहुंचाने में शामिल हैं।
खतरनाक जगहों से 57 बच्चों की छुड़ाई
संबंधित विभाग के अधिकारियों के अनुसार, वर्षभर में अलग-अलग स्थानों पर की गई कार्रवाई के दौरान 57 बच्चों को छुड़ाया गया। जांच में इन बच्चों से खतरनाक परिस्थितियों में काम करवाए जाने की बात सामने आई थी। ऐसे मामलों में बच्चों की सुरक्षा के साथ उनके पुनर्वास और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई को भी प्राथमिकता देने की जरूरत बताई जा रही है।
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