सूखे में बर्बाद हुई केले की फसल, सदमे के बीच 70 वर्षीय किसान की हार्ट अटैक से मौत

नांदेड़ जिले में लाखों रुपये खर्च कर तैयार की गई तीन केले की बागों से लागत भी नहीं निकल सकी। परिवार के मुताबिक, सूखे और फसल के नुकसान से किसान आर्थिक संकट में थे।

राहुल गुप्ता

नांदेड़, 17 अक्टूबर। मराठवाड़ा में सूखे की मार किसानों पर भारी पड़ रही है। बारिश की कमी के कारण केले की फसल बर्बाद होने से आर्थिक संकट का सामना कर रहे मुदखेड़ तालुका के शेंबोली गांव निवासी 70 वर्षीय किसान महाजन तुकाराम कुसुमवाड की 15 अक्टूबर को सुबह करीब 5 बजे दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। इस घटना से इलाके में शोक का माहौल है।

तीन केले की बागों पर लाखों का खर्च

किसान के बेटे बालाजी के मुताबिक, परिवार ने केले की तीन बागों में करीब 4,000 पौधे लगाए थे। इन्हें तैयार करने के लिए लगभग 1.25 लाख रुपये खर्च किए गए थे। लेकिन पर्याप्त बारिश नहीं होने और बढ़ती गर्मी के कारण केले समय से पहले पकने लगे। इससे फसल के गुच्छों को सही समय पर बाजार तक पहुंचाने का मौका नहीं मिला।

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बालाजी ने बताया कि दो बागों से करीब 70,000 रुपये की उपज मिली, जबकि तीसरी बाग की पूरी फसल बर्बाद हो गई। ऐसे में आमदनी खेती पर हुए खर्च से कम रही और परिवार आर्थिक परेशानी में घिर गया। खेत में बची फसल और केले के तनों को हटाने के लिए भी अब अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा।

फसल के नुकसान के बीच बिगड़ी तबीयत

परिवार के अनुसार, महाजन कुसुमवाड केले की फसल बर्बाद होने से बेहद परेशान थे। 15 अक्टूबर की सुबह उन्हें दिल का दौरा पड़ा। परिजन उन्हें बारड के एक निजी अस्पताल ले गए, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई।

महाजन कुसुमवाड के परिवार में पत्नी, दो बेटे, बहुएं और तीन पोते-पोतियां हैं। बड़ा बेटा बालाजी एक निजी संस्थान में कम मानदेय पर शिक्षक है, जबकि दूसरा बेटा शंकर खेती करता है। परिवार की आजीविका मुख्य रूप से खेती पर निर्भर है।

मराठवाड़ा में केले के उत्पादक भी संकट में

नांदेड़ जिले के मुदखेड़ और अर्धापुर तालुकों में सूखे से केले की खेती प्रभावित हुई है। किसानों का कहना है कि उत्पादन, मजदूरी और परिवहन की लागत तक वसूल नहीं हो पा रही है। कई किसानों को बागें हटाने या खड़ी फसल कम कीमत पर बेचने की नौबत आ रही है।

मराठवाड़ा में केले के साथ कपास, हल्दी, गन्ना और सोयाबीन की फसलें भी सूखे से प्रभावित हैं। शेंबोली की घटना ने संकट से जूझ रहे किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता देने की जरूरत को फिर सामने ला दिया है।

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