महाराष्ट्र सरकार ने हिंदी भाषा परीक्षा की अनिवार्यता खत्म की, 50 साल पुराने नियम पर लगा विराम

न्यूज़म ब्यूरो

मुंबई, 2 सितंबर।

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भाषा का मुद्दा गरमा गया है। राज्य सरकार ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आयोजित की जाने वाली हिंदी भाषा परीक्षा को पूरी तरह खत्म करने का आदेश जारी किया है। इस फैसले के साथ ही करीब 50 साल पुराने उस नियम पर भी विराम लग गया है, जिसके तहत कुछ कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा पास करना जरूरी था। अब अधिकारियों और कर्मचारियों को नौकरी में वेतन वृद्धि या पदोन्नति के लिए हिंदी भाषा की परीक्षा पास करने की बाध्यता नहीं रहेगी।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर सरकार को यह फैसला क्यों लेना पड़ा और इसके पीछे किसका दबाव था? मामला जून 2026 में उस वक्त सामने आया, जब भाषा संचालनालय की ओर से सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा आयोजित करने की घोषणा की गई थी। परीक्षा की तारीख 28 जून तय की गई थी। घोषणा होते ही महाराष्ट्र में इसका विरोध शुरू हो गया। राजनीतिक दलों के साथ-साथ कई मराठी भाषा से जुड़े संगठनों ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए।

उद्धव गुट ने भी सरकार को घेरा

उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा। पार्टी की ओर से सवाल उठाया गया कि जब मराठी को हाल ही में शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला है, तो महाराष्ट्र के कर्मचारियों पर हिंदी परीक्षा पास करने की जिम्मेदारी क्यों डाली जा रही है? पार्टी ने यह सवाल भी उठाया कि क्या गुजरात या पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा अनिवार्य है?

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1976 से चली आ रही हिंदी परीक्षा की व्यवस्था

कुल मिलाकर, 1976 से चली आ रही हिंदी परीक्षा की व्यवस्था को करीब पांच दशक बाद पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। सरकार का तर्क है कि महाराष्ट्र के भीतर प्रशासनिक कामकाज की भाषा मराठी है, जबकि दूसरे राज्यों के साथ आधिकारिक पत्राचार अंग्रेजी में किया जाता है।

ऐसे में सरकारी कर्मचारियों पर अलग से हिंदी परीक्षा थोपने का कोई औचित्य नहीं बचता। सरकार के इस फैसले ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भाषा और मराठी अस्मिता के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है।

एमएनएस ने दी थी परीक्षा केंद्रों पर प्रदर्शन की चेतावनी

राज ठाकरे की मनसे ने हिंदी परीक्षा का सबसे मुखर विरोध किया था। मनसे नेता संदीप देशपांडे ने इसे केंद्र के इशारे पर हिंदी थोपने की कोशिश बताया। पार्टी ने चेतावनी दी थी कि अगर 28 जून को परीक्षा कराई गई तो उसके कार्यकर्ता परीक्षा केंद्रों पर प्रदर्शन करेंगे।

मनसे ने यह भी कहा था कि इसके बाद कानून-व्यवस्था की कोई स्थिति बनती है तो उसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी।

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