1200 एकड़ सरकारी जमीन पर घमासान, सुप्रिया सुले के दामाद की कंपनी को लेकर अंजली दमानिया ने उठाए सवाल

दमानिया ने बिना टेंडर जमीन देने, सुरक्षा जमा माफ करने और लंबे पट्टे समेत कई शर्तों पर सवाल उठाए; सुप्रिया सुले ने भी दी प्रतिक्रिया।

राहुल गुप्ता

मुंबई, 8 अक्टूबर। महाराष्ट्र में 1200 एकड़ सरकारी जमीन को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता अंजली दमानिया ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले के दामाद से जुड़ी कंपनी को जमीन दिए जाने के फैसले पर कई सवाल उठाए हैं। दमानिया ने पूछा है कि इतनी बड़ी सरकारी जमीन को बिना निविदा प्रक्रिया के सीधे निजी कंपनी को क्यों दिया गया और सुरक्षा जमा की शर्त क्यों हटाई गई।

दमानिया के मुताबिक, इस मामले में 2 सप्ताह के भीतर 2 शासन निर्णय जारी किए गए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जून में इसी जमीन पर महाराष्ट्र ऊर्जा विकास अभिकरण के जरिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत ग्रीन एनर्जी पार्क विकसित करने का फैसला किया गया था, लेकिन सितंबर में जमीन सीधे एक निजी कंपनी को देने का निर्णय क्यों लिया गया।

पट्टे और उपपट्टे की शर्तों पर भी सवाल

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दमानिया ने जमीन के लंबे पट्टे को लेकर भी आपत्ति जताई है। उन्होंने सवाल किया कि जमीन को पहले सीमित अवधि के लिए देकर कंपनी के काम का आकलन क्यों नहीं किया गया। उन्होंने समूह की कंपनियों को जमीन का उपपट्टा देने की अनुमति और इसके लिए महाराष्ट्र राज्य कृषि महामंडल की अनापत्ति प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होने वाली शर्त पर भी सवाल उठाया।

इसके अलावा, सार्वजनिक हित में जमीन वापस लेने की स्थिति और जमीन की बिक्री होने पर संबंधित कंपनी को दिए गए कथित प्रथम अधिकार पर भी दमानिया ने आपत्ति जताई है। उन्होंने मांग की कि सरकारी जमीन के लिए पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाए और सबसे ज्यादा किराया देने वाली कंपनी को जमीन दी जाए। साथ ही सुरक्षा जमा लिया जाए तथा उपपट्टे और बिक्री में प्रथम अधिकार जैसी शर्तों को हटाया जाए।

सुप्रिया सुले ने क्या कहा?

विवाद के बीच सुप्रिया सुले ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने दमानिया के सवालों पर कहा कि उनके दामाद क्या करते हैं, यह उनका अपना मामला है और वह इस बारे में कैसे बोल सकती हैं।

दमानिया ने महाराष्ट्र की आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि यदि राज्य के आर्थिक हितों की चिंता है तो जमीन को प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के जरिए अधिकतम किराया देने वाली कंपनी को दिया जाना चाहिए।

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