राहुल गुप्ता
मुंबई, 29 सितंबर। महाराष्ट्र के 265 तालुकों में सूखा घोषित होने के बीच राज्य सरकार के एक वाहन खरीद संबंधी फैसले को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सरकार ने लोकायुक्त संस्था के चार सदस्यों के लिए नए वाहनों की खरीद को मंजूरी दी है। इससे पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सूखे की स्थिति को देखते हुए नागरिकों से शादी समारोह और अन्य आयोजनों में गैर-जरूरी खर्च कम करने की अपील की थी। राज्य में 358 में से 265 तालुकों में सूखा घोषित किया गया है।
लोकायुक्त के चार सदस्यों के लिए वाहन
सरकार की ओर से सितंबर में जारी आदेश के मुताबिक, लोकायुक्त संस्था के चार सदस्यों के लिए वाहनों की खरीद को मंजूरी दी गई है। इनमें सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुनील शुक्रे, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुरेंद्र तावडे, सुवर्णा केवले और पूर्व आईपीएस अधिकारी रश्मि शुक्ला तथा पूर्व आईएएस अधिकारी ओ. पी. गुप्ता का उल्लेख संबंधित रिपोर्टों में किया गया है। लोकसत्ता की रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक वाहन के लिए करीब 30 लाख रुपये की सीमा तय की गई थी और इस राशि में जीएसटी, मोटर वाहन कर तथा पंजीकरण शुल्क शामिल नहीं थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, लोकायुक्त कार्यालय के लिए पहले चार वाहन मंजूर थे, जिनकी संख्या बढ़ाकर सात की गई है। सचिव के लिए भी एक वाहन मंजूर किया गया है।
सूखे के बीच खर्च घटाने की मुख्यमंत्री की अपील
महाराष्ट्र में इस साल मानसून की कमी और लंबे सूखे के बाद 265 तालुकों में सूखा घोषित किया गया है। सरकार ने इसके साथ फसल नुकसान का आकलन और राहत उपाय शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने लोगों से सूखे की स्थिति को देखते हुए शादी समारोह और अन्य आयोजनों में गैर-जरूरी खर्च कम करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि जरूरी खर्च किए जाने चाहिए, लेकिन जिन खर्चों को टाला या कम किया जा सकता है, उनमें कटौती की जानी चाहिए और बची रकम से सूखा प्रभावित लोगों की मदद की जा सकती है।
फैसले को लेकर उठ रहे सवाल
एक ओर सरकार सूखा प्रभावित इलाकों के लिए राहत उपाय लागू कर रही है और मुख्यमंत्री नागरिकों से खर्च कम करने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लोकायुक्त संस्था के लिए वाहनों की खरीद को मंजूरी दिए जाने से सरकारी खर्च को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
हालांकि, दोनों फैसलों का प्रशासनिक संदर्भ अलग है और वाहन खरीद लोकायुक्त संस्था के लिए स्वीकृत सरकारी सुविधा के तहत की जा रही है। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों या अन्य पक्षों की आपत्तियों को उनके बयानों के साथ ही देखा जाना चाहिए।
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