न्यूज़म ब्यूरो
मुंबई, 7 अक्टूबर। संसद भवन से निर्वाचन सदन तक विपक्षी सांसदों के मार्च को लेकर शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कांग्रेस और विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं ने इस मार्च को भले ही ‘लोकतंत्र बचाओ मोर्चा’ नाम दिया हो, लेकिन वास्तव में यह लोकतंत्र बचाने का नहीं, बल्कि परिवार और राजनीतिक अस्तित्व बचाने का प्रयास है।
निरुपम ने कहा कि मार्च में शामिल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, यूबीटी और शरद पवार की एनसीपी जैसी पार्टियों पर परिवारवाद की राजनीति के आरोप लगते रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये पार्टियां लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठाने से पहले अपने भीतर की राजनीतिक व्यवस्था पर भी सवाल करें। उन्होंने आगे अपनी भूमिका रखते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इन दलों के पारंपरिक राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती मिली है। ऐसे में चुनावी राजनीति में लगातार संघर्ष कर रहे विपक्षी दल अब निर्वाचन आयोग के मुद्दे को राजनीतिक आंदोलन का रूप दे रहे हैं।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर विपक्ष के सवालों को लेकर निरुपम ने कांग्रेस के पुराने शासनकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि नियुक्ति व्यवस्था में सुधार और विपक्ष की भागीदारी का मुद्दा नया नहीं है। चुनाव आयोग से संबंधित नियुक्तियों और उसकी स्वतंत्रता को लेकर विभिन्न समितियों और आयोगों ने समय-समय पर सुझाव दिए हैं। २००६ में भी चुनाव सुधारों से जुड़े कई प्रस्ताव सरकार और संसद के स्तर पर विचाराधीन थे।
निरुपम ने कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के दौर में भी चुनाव आयोग से जुड़े नियुक्ति विवाद सामने आए थे। २००६ में तत्कालीन चुनाव आयुक्त नवीन चावला की नियुक्ति और उनकी कथित राजनीतिक निकटता को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए थे तथा मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।
निरुपम ने कहा कि आज राहुल गांधी और विपक्ष चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कॉलेजियम जैसी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने शासनकाल का इतिहास भी देखना चाहिए। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने वाली समिति की व्यवस्था बाद में सुप्रीम कोर्ट के २०२३ के फैसले और उसके बाद बने कानून के संदर्भ में विकसित हुई। उन्होंने कहा कि इसलिए विपक्ष को केवल राजनीतिक आरोप लगाने के बजाय चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, नियुक्ति प्रक्रिया और अपने पुराने रुख पर तथ्यात्मक बहस करनी चाहिए।
निरुपम ने कहा कि जनता के सामने असली मुद्दा यह है कि विपक्षी दल चुनाव आयोग पर सवाल उठाने के साथ-साथ अपने राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र और परिवारवाद पर भी जवाब दें। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष का यह मार्च लोकतंत्र बचाने के नाम पर किया गया राजनीतिक प्रदर्शन है और इसका मुख्य उद्देश्य अपने परिवारों तथा राजनीतिक प्रभाव को बचाना है। उन्होंने कहा कि इसे ‘लोकतंत्र बचाओ मोर्चा’ कहने के बजाय ‘परिवार बचाओ मोर्चा’ कहना ज्यादा उचित होगा।
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