अल्बानिया और बांग्लादेश के घटनाक्रम से सबक लेने की बात पर जताई असहमति, चुनाव और संवैधानिक संस्थाओं को बताया सत्ता परिवर्तन का आधार
न्यूज़म ब्यूरो
मुंबई, 20 अक्टूबर। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राऊत की अल्बानिया में जारी हिंसा से जुड़ी सोशल मीडिया पोस्ट पर पार्टी की नेता और पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने असहमति जताई है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत में सत्ता परिवर्तन का रास्ता चुनाव और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से होकर गुजरता है। लोकतंत्र में हिंसा के जरिए सत्ता बदलने की कोई जगह नहीं है और भारत को इसके लिए दूसरे देशों से सीख लेने की आवश्यकता नहीं है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही बदलती है सत्ता
मीडिया से बातचीत में प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि भारत में अब तक सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रक्रिया और चुनावों के माध्यम से हुआ है। आपातकाल के बाद भी देश में चुनाव हुए और लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता बदली। ऐसे में दूसरे देशों में हुई हिंसक घटनाओं को सत्ता परिवर्तन के उदाहरण के रूप में पेश करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि अल्बानिया एक छोटा देश है, जिसने लंबे समय तक कम्युनिस्ट तानाशाही का सामना किया है। वहां की परिस्थितियों की तुलना भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था से नहीं की जा सकती। उन्होंने जोर दिया कि भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए संवैधानिक व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया का ही पालन होना चाहिए।
संसद और न्यायपालिका को निशाना बनाना गलत
प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन कानून अपने हाथ में लेना और सर्वोच्च न्यायालय, संसद या अन्य संवैधानिक संस्थानों को निशाना बनाना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। लोकतंत्र में असहमति जताने और सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए हिंसा का सहारा नहीं लिया जा सकता।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करना और संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना जरूरी है। हिंसक घटनाओं को सत्ता परिवर्तन का आदर्श बताने से लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंच सकता है।
बांग्लादेश के घटनाक्रम पर भी जताई चिंता
प्रियंका चतुर्वेदी ने सत्ता परिवर्तन के लिए बांग्लादेश और अल्बानिया में हुए विरोध-प्रदर्शनों से प्रेरणा लेने की सोच पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं को केवल छात्रों के आंदोलन तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। बांग्लादेश में विरोध-प्रदर्शनों के बाद इस्लामी आंदोलनों के प्रभाव और हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं सामने आई हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी देश में विरोध-प्रदर्शन के कारणों और सरकार की कार्रवाई की समीक्षा की जा सकती है, लेकिन हिंसा के माध्यम से सत्ता परिवर्तन का समर्थन नहीं किया जा सकता।
संजय राऊत ने अल्बानिया की घटनाओं का किया था जिक्र
दरअसल, संजय राऊत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अल्बानिया में जारी हिंसा का उल्लेख करते हुए दावा किया था कि भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर लोगों में व्याप्त गुस्से के कारण प्रदर्शनकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय, संसद, सरकारी कार्यालयों और मंत्रियों के आवासों को निशाना बनाया। उन्होंने इन घटनाओं से दूसरे देशों, विशेषकर भारत, को सबक लेने की बात कही थी।
इसी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रियंका चतुर्वेदी ने हिंसा के जरिए सत्ता परिवर्तन की अवधारणा को खारिज किया और कहा कि भारत में लोकतंत्र की मजबूती का आधार चुनाव, संवैधानिक संस्थाएं और कानून का शासन है।
पढ़ने के लिए धन्यवाद
आपका समय और भरोसा हमारे लिए बहुत मायने रखता है। अगर यह खबर आपके लिए उपयोगी रही, तो हमसे जुड़े रहें — हर ज़रूरी खबर के लिए Newsam को फ़ॉलो करें।