चार दलों की ताकत और मुख्यमंत्री के समर्थन के बावजूद महायुति को हार का सामना करना पड़ा; सहकारी संस्थाओं के चुनाव में दलगत राजनीति का प्रयोग सफल नहीं रहा।
राहुल गुप्ता
कोल्हापुर, 22 अक्टूबर। सहकारी संस्थाओं के चुनाव में एक ही दल के कट्टर प्रतिद्वंद्वियों और अलग-अलग पार्टियों के विरोधियों का एक साथ आकर चुनाव लड़ना आम बात रही है। लेकिन इस परंपरा से हटकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), अजित पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना और जनसुराज्य शक्ति पार्टी ने पहली बार महायुति के माध्यम से गोकुल दूध संघ का चुनाव लड़ने का प्रयास किया।
चारों दलों की मजबूत ताकत और मुख्यमंत्री के समर्थन के बावजूद महायुति को सफलता नहीं मिली। दूसरी ओर, केवल विधायक सतेज पाटिल के नेतृत्व वाली समविचारी आघाड़ी ने महायुति की विकास आघाड़ी को करारी शिकस्त दी। इस नतीजे ने महायुति को बड़ा झटका दिया है।
सहकार के चुनाव में दलगत राजनीति का प्रयोग पड़ा भारी
गोकुल दूध संघ के चुनाव में पार्टी के झंडे के साथ उतरने का महायुति का प्रयोग सफल नहीं हो सका। सहकारी संस्थाओं के चुनाव में स्थानीय समीकरणों, आपसी तालमेल और सहकार क्षेत्र की पारंपरिक राजनीति को अहम माना जाता है। ऐसे में चार दलों के एकजुट होने के बावजूद महायुति को हार का सामना करना पड़ा।
इस नतीजे से सहकारी संस्थाओं के चुनाव सीधे राजनीतिक दलों के माध्यम से लड़ने की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं। सहकार क्षेत्र में महायुति का यह पहला प्रयोग ही उसके लिए नुकसानदेह साबित हुआ, जबकि सतेज पाटिल के नेतृत्व वाली आघाड़ी ने अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया।
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